Who Am I ? (9 - 12)
रमण महर्षि के उपदेश : 1
मैं कौन हूँ? (1 - 8)

मैं कौन हूँ? (9 – 12)

रमण महर्षि के उपदेश

ॐ नमो भगवते श्रीरमणाय

 

मैं कौन हूँ?

  1. मन के रूप को समझने के लिए अन्वेषण का पथ क्या है?

शरीर में, जो ‘मैं’ के रूप में उदित होता है, वह मन है। जब कोई खोज करता है कि सर्वप्रथम ‘मैं’ का विचार शरीर में कहाँ से उदित होता है, तो उसे पता चलता है कि यह हृदय से उदित होता है। वह मन के उदित होने का स्रोत है। यदि कोई लगातार ‘मैं’ – ‘मैं सोचता है, तो वह उस स्थान (स्रोत) पर पहुँच जाएगा। मन में उदित होनेवाले समस्त विचारों में मैं’ का विचार प्रथम है। प्रथम व्यक्ति सर्वनाम के उदित होने के बाद ही, द्वितीय एवं तृतीय सर्वनाम प्रकट होते हैं। प्रथम वैयक्तिक सर्वनाम के बिना द्वितीय या तृतीय नहीं हो सकते।

 

  1. मन स्थिर (शान्त) कैसे होगा?

‘मैं कौन हूँ?’ के अन्वेषण द्वारा ही मन शान्त होगा। मैं कौन हूँ? का विचार, अन्य सभी विचारों को नष्ट कर देगा तथा जिस प्रकार शव जलानेवाला लुआठा भी अन्त में स्वयं जल जाता है, उसी प्रकार यह भी स्वयं नष्ट हो जाएगा। तब वहाँ स्वरूप-दर्शन होगा।

 

  1. ‘मैं कौन हूँ?’ के विचार को निरन्तर बनाए रखने का उपाय क्या है?

जब दूसरे विचार उदित हों, तो व्यक्ति को उन पर ध्यान नहीं देना चाहिए, बल्कि अन्वेषण करना चाहिए कि वे विचार किसके लिए उदित होते हैं?’ चाहे जितने भी विचार उदित हों, उनसे कोई अंतर नहीं पड़ता है। जैसे ही कोई विचार उदित हो, व्यक्ति को तत्परता से खोज करनी चाहिए कि किसके लिए यह विचार उदित हुआ?’ उत्तर आएगा – ‘मेरे लिए’। इस पर जब व्यक्ति खोज करे कि मैं कौन हूँ? तो मन अपने स्रोत में वापिस चला जाता है और उदित हुआ विचार शान्त हो जाता है। इसके बारंबार अभ्यास से मन अपने स्रोत में रहने की दक्षता विकसित कर लेता है। मन जो सूक्ष्म है, जब बुद्धि एवं ज्ञानेन्द्रियों के द्वारा बाहर जाता है, तो स्थूल नाम, रूप प्रकट होते हैं और जब यह हृदय में निवास करता है, तो नाम, रूप विलुप्त हो जाते हैं। मन को बाहर जाने से रोककर, उसे हृदय में स्थिर करने को अहंमुख या अंतर्मुखी होना कहते हैं। मन को हृदय से बाहर जाने देने को बहिर्मुखी होना कहते हैं। इस प्रकार जब मन हृदय में निवास करता है, तो मैं जो सभी विचारों का मूल है, लुप्त हो जाता है और सदैव अस्तित्त्वमान् ‘स्वरूप’ प्रकाशित होता है। व्यक्ति चाहे जो भी करे, उसे बिना ‘मैं’ के अहंकार के कर्म करना चाहिए। जब कोई इस प्रकार से कर्म करता है, तो उसके समक्ष सब कुछ ‘शिव-स्वरूप’ के रूप में प्रकट होगा।

 

 12. क्या मनोनिग्रह के दूसरे उपाय नहीं हैं?

आत्म-विचार के अतिरिक्त, कोई अन्य उपाय उपयुक्त नहीं हैं। यदि दूसरे उपायों से मन:नियंत्रण का प्रयास किया जाए, तो लगता है कि मन नियंत्रित है किन्तु वह पुन: प्रकट हो जाता है। प्राणायाम के द्वारा भी मन स्थिर हो जाएगा किन्तु वह तभी तक नियंत्रित रहेगा जब तक कि प्राण नियंत्रित है और जब श्वसन आरम्भ होगा, तो मन पुन: गतिशील हो जाएगा तथा संचित वासनाओं के अनुरूप भटकेगा।

मन और प्राण, दोनों का स्रोत एक ही है। निश्चित ही विचार, मन का रूप है। मैं का विचार, मन का प्रथम विचार है और यही अहंकार है। जहाँ से अहंकार उत्पन्न होता है, वहीं से श्वसन भी आरम्भ होता है। इसलिए जब मन स्थिर होता है, तो श्वास नियंत्रित हो जाता है और जब श्वास नियंत्रित होता है, तो मन स्थिर हो जाता है। किन्तु सुषुप्ति में, यद्यपि मन स्थिर रहता है किन्तु श्वास नहीं रुकता है। यह ईश्वरीय इच्छा के कारण है। ताकि शरीर सुरक्षित रहे और लोग यह नहीं समझें कि यह मर गया है। जाग्रत एवं समाधि की अवस्थाओं में, जब मन स्थिर हो जाता है, तो श्वास नियंत्रित रहता है। प्राण, मन का स्थूल रूप है। मृत्यु के क्षण तक मन, प्राण को शरीर में रखता है। जब शरीर मर जाता है तो मन, प्राण को साथ ले जाता है। इसलिए प्राणायाम का अभ्यास मनोनिग्रह में सहायक तो है किन्तु यह मन का नाश नहीं करता।

प्राणायाम की भाँति मूर्तिध्यान, मंत्रजप, आहार-नियमन, इत्यादि मन को स्थिर करने में सहायक हैं। मूर्तिध्यान एवं मंत्रजप से मन एकाग्र हो जाता है। मन का स्वभाव है – सदा चंचल रहना। जैसे सदा हिलते रहनेवाले हाथी की सँड़ में यदि एक जंजीर दे दी जाए, तो वह हाथी किसी अन्य वस्तु को पकड़ने का प्रयत्न किए बिना ही, उस ज़ंजीर को पकड़ कर चलता रहेगा, उसी प्रकार मन को भी किसी नाम या रूप (ईश्वर के) में अनुरक्त रहने के अभ्यास से जोड़ा जाए, तो वह उसी को ग्रहण किए रहेगा। मन जब असंख्य विचारों के रूप में फैलता है, तो प्रत्येक विचार अत्यंत बलहीन होता है किन्तु विचारों के लीन (लुप्त) होते ही मन एकाग्र एवं बलवान हो जाता है। ऐसे मन के लिए आत्मअन्वेषण सरल हो जाता है। सकल नियमों में से श्रेष्ठ है – मित एवं सात्विक आहार। इन नियमों के पालन से मन में सद्गुण की वृद्धि होती है, जो आत्म-अन्वेषण में सहायक है।

 

 

 

 

 

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